अनाड़ी

कितने ही कविता – कहानी मैं लिखुँ,
सीख न पाया मैं फिर बातें करना ।

कितने ही नाटक किये हैं मैनें,
पर सीख न पाया मुखड़ा लगाना ।

सबकी सुलझी बातें सुनी है मैनें,
पर सीख न पाया मैं बहाने बनाना ।

कितने ही तिजोरी बनाये थे मैनें,
पर छिपा न सका मैं कोई खजाना ।

बड़ी जतन से रिश्ते बुने थे मैनें,
सीखा न कोई आज दोस्त बनाना ।

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