कितने ही कविता – कहानी मैं लिखुँ,
सीख न पाया मैं फिर बातें करना ।

कितने ही नाटक किये हैं मैनें,
पर सीख न पाया मुखड़ा लगाना ।

सबकी सुलझी बातें सुनी है मैनें,
पर सीख न पाया मैं बहाने बनाना ।

कितने ही तिजोरी बनाये थे मैनें,
पर छिपा न सका मैं कोई खजाना ।

बड़ी जतन से रिश्ते बुने थे मैनें,
सीखा न कोई आज दोस्त बनाना ।

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0 comments

  • Dreamer

    khelaadi bankar harne se toh anari hona behtar.

    aap ki kavita bahut sundar hai. Dil ko choo gaii

    February 25, 2008 at 2:01 pm Reply

  • FUCK OFF!!!

    This a bloody fuckin poem!!!!!!

    June 18, 2010 at 11:32 am Reply