काली हो या नीली पीली,
शांत हो या छैल छबीली,
सुनहरी हो या फिर मटमैली,

अपनी बगिया अपने रंग में,
अपनी गति अपनी चाल से,
गाये गीत अपनी ताल में,

कलियों पर फिर पंख फैलाते,
कभी शरमाते कभी घबराते,
या फिर कभी उधम मचाते,

उन पुष्पों के नि:श्छल प्रेम में,
तितलियाँ खेलें जब बगियन में,
माली को फिर अच्छा लगता है ।

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0 comments

  • Juneli

    Beautiful poem. 🙂

    May 25, 2007 at 4:14 pm Reply

  • Prem Piyush

    @Juneli,
    Thanks a lot 🙂

    June 9, 2007 at 2:34 pm Reply

  • Dreamer

    mujhe bhi acchaa lagta hai

    February 25, 2008 at 1:59 pm Reply

  • prevesh

    hi

    June 27, 2009 at 10:31 am Reply

  • Kavya

    Mujhe bhi achi lagi ye poem…………
    very lovely poem…………

    October 20, 2009 at 5:19 pm Reply